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Friday, 20 January 2017

शाम


शाम उतर रही है 
हलके हलके कदमों से ज़मीं पर 
किरनें छुडा रही है 
अपने हाथ हलके हलके...

अमन ने थाम लिये अब शाम के हाथ 
नूर बन कर बरस रहीं है चाँदनी भी
शाम की आँखों से अब
छलक रही है ख़ुशी हलके हलके...

इनायत है शाम ख़ुदा की 
छा रही है हलके हलके
थके हारे दिन को 
भा रही है हलके हलके...

कदम बढ़ाती शाम 
ढलेगी रूप में रात के 
उसकी गोद में करवट लेकर
चैन से साँस लेगा दिन हलके हलके...


:) 
  
सोनल
  

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