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Friday, 30 December 2016

गुज़रता साल



पल...
      गुज़रते रहतें हैं
      अपनी रफ़्तार क़ायम रखे 
                 वक़्त बहता रहता है।


हम...
      एक छोटेसे तिनके की तरह हलकेसे
      इस वक़्त की नदिया में आ कर गिरतें हैं।
      थोड़ासा उम्र का फ़ासला काँटते हैं बस्
      और इसी नदिया में कहीं ग़ुम हो जातें हैं।
       इस छोटेसे फ़ासले में 
       जानें क्या क्या कर गुजरतें हैं।
       आगे बढ़ते बढ़ते कई दफा गिरतें हैं,
       उठतें हैं, रुकतेँ हैं, दौड़तेँ हैं
       पर सफ़र पूरा कर ही दम लेते हैं...
                नहीं, 
                       असल में दम छोड़तें हैं।



इस छोटेसे सफ़र को कई सारे टुकड़ों में बाँट देतें हैं हम
एक टुकड़ा नए साल के नाम से जाना जाता है।

साल...
       हर साल बदलता है।
       वैसे तो हर पल कुछ नयी सीख़ दे कर जाता है,
       मगर हर साल दिसंबर में 31 को लोगों को सब याद आता हैं।
       पक्के कच्चे, बुरे अच्छे सारे पल,
       सारी यादें जैसे इस एक दिन में सिमटी सी जाती हैं।
       पूरा गुज़रता साल कुछ ही पलों में हम मुड़कर देखतें हैं।
       मुस्कुराहटें, आंसू, ग़म और खुशियाँ
       सारे जैसे एक साथ नम हो जातें हैं।
       इन्हें यूँही बुत बन कर देख सकते हैं हम।

हम...
       चौकट पर आ कर गुज़रते साल का हाथ छोड़ते
       नए सवेरे की ऊँगली थामने बेक़रार रहतें हैँ।

पल...
      गुज़रते रहतें हैँ
      हम भी बढ़तें रहतें हैँ इनकी तरंगों पर।
      खोना तो होता ही है सब को, इस सफ़र में किसी मुकाम पर...
      और हम, नयी मंज़िलें ढूँढते रहतें हैं।
       एक दिन एक छोटेसे बुलबुले की तरह हलकेसे
       इस वक़्त की नदिया से हम उड़ भी जातें हैं।

पल गुज़रते रहतें हैं,
     अपनी रफ़्तार क़ायम रखे वक़्त बहता रहता है।
हम चौकट पर आ कर गुज़रते साल का हाथ छोड़ते,
      नए सवेरे की ऊँगली थामने बेक़रार रहतें हैँ।


-

नये साल की शुभकामनाएँ

                                           सोनल 
                                                         :)

Saturday, 3 December 2016

पुस्तकं

(एखादा छंद, एखादी कला जोवर सोबत आहे तोवर या जगात कोणी एकटं पडेल असं मला वाटत नाही... असाच सतत सोबत असणारा एक छंद - भावसौंदर्य व्यक्त करणारी पुस्तकं...)

मैत्री असावी पुस्तकांशी
एकाकीपण सुसह्य होतं

आपली माणसं, आपलं प्रेम, आपली श्रद्धा आणि आपला विश्वास...
खोटी भुलावण आपणच आपली करत असतो,
आणि या आपल्यांची सोबत सुटल्यावर एकाकी आपणच रडत बसतो.

अशा वेळी फक्त पुस्तकं येतात साथीला.
हळूच डोळ्यांतून हृदयात उतरणं जमतं त्यांना...
हृदयाला भिडलेली पुस्तकं मग कधी उशाशी, कधी कुशीशी येतात;
एखाद्या जीवलगासारखी.
ती रुसत नाहीत, राग धरत नाहीत, ना कधी हट्टाला पेटतात.

जे आहे ते सरळ स्वच्छ;
उघडून अंतरंग सारं सांगतात.
कोणती कोडी घालत नाहीत, की कोणत्या अटी.
स्वभाव तर किती खुला, आसमंतासारखा निर्मळ...
सागरासारखी खोली आणि एकच काय ते जगण्याचं तत्व,
'तू मला वाचून मला समजून घ्यायचा प्रयत्न केलास,
मी तुला माझा सारा आनंद, सारं प्रेम देतो.'

आपला जीव जडलेली माणसंही या पुस्तकांसारखी असती तर...?!!

:)
   -
     सोनल