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Monday, 2 November 2015

सुलझन

(कभी कभी खुद की शांती मन को डरा देती है...
कभी कभी खुद ही को मिले सवालों के जवाब मानने के लिए मन तैयार नहीं होता...
कभी कभी इक दुष्कर लगने वाली उलझन सुलझ जाएँ, तो भी यह मन उस आनंद का भार झेल नहीं पाता...
ऐसी सुलझन पे भला कोई क्या करें?)


खुद की तलाश में हम
       ना जाने कहाँ आ गए
यहाँ तो मददगार ख़ुदा को आवाज़ दी तो भी
       तसल्ली में खुद की आवाज़ ही सुनाई दे रही हैं

क्या खुद को पा गएँ हैं हम?
       या खो दिया है अपने ही ख़ुदा को इस तलाश में?

कैसी हैं यह सुलझन?
                      सुकूँ पा कर भी अब
                                              बेक़रार हो रहें हैं...!


   -
सोनल  :)


छायाचित्रकार: रसिका शिलेदार



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