काश
यह सही होता
उम्र का तकाज़ा दोस्ती को कभी ना होता...
सभी झगड़ें उसी मासूमियत के साथ सुलझाएँ जातें
काश
हम भी कभी दिल बड़ा कर दोस्त की गलतियाँ भुला पातें...
झगड़ें कितने भी बडे हो, दोस्त की मुस्कराहट जज्बातों से बढ़कर होती
काशआज भी नादानियों को माफ़ करने की मासूम समझ जिंदा होती...
जिस दोस्त की हम जान है वह कभी सहम जाए
तो उसे बड़ों की तरह सँवारने की ताक़त होती
काश
कभी हाथ थामें हँसते थे जिसके
उसीको रुलातें अपनी भी आँखे भर आती...
दोस्त से चुप्पी कुछ घंटें ही टिक पाती
काश
जिस दोस्त का दिल मासूम बच्चा ही है
उसके अल्हड़ मगर सच्चे प्यार में अपनी ख़ुद्दारी भी हार जाती...
काश
यह सही होता
उम्र का तकाज़ा दोस्ती को कभी ना होता...
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सोनल
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सोनल

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